🥗भाग 32🥗
🥗🥗🥗चमत्कारी औषधि मकोय(काकमाची):-

🥗आपके शरीर के दो ही अंग हैं जिन पर खानपान व जीवन शैली का गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिनमें पहला है यकृत और दूसरा हृदय जिसे दिल भी कहते हैं।
🥗इन दोनों अंगों में रोग हो जाने पर विशेष बात यह है कि लाखों लग जाए इसकी संभावना भी कम नही सो अपनी जीवन चर्या ऐसी बनाओ कि रोग पास ही न फटकें
🥗मकोय के अलग-2 भाषा में नाम :-
संस्कृत -काकमाची
अन्य-चरगोटी,चरबोटी,चिरपोटी,कबैया या गुरुमकाई
गुजराती – पीलूडी
मराठी – लघु कावड़ी
मुम्बई – घाटी,कामुनी या मको
पंजाबी – कचमच,मको व कॉसफ
बंगाल-काकमाची,मको,तलीदन या गुड़काभाई
तमिल – मानतक्कली ,
तेलगू -वाजचेट्टू,कंमाची,या काकमाची,
उर्दू -मकोय,
अग्रेजी -कामन नाइट शेड
🥗पहचान:-
यह मिर्च के पौधे जैसा पोधा होता है जिसकी अधिकतम ऊँचाई 3 फिट के लगभग हो सकती है।इस पर फूल भी लगभग मिर्च जैसा ही आता है और मिर्च जैसी डालियाँ भी होती हैं इसके फल छोटे छोटे तथा समूह में होते है ये गोल गोल होते हैं पकने पर लाल हो जाते हैं तथा बाद में काले हो जाते हैं।इसके पुष्प मिर्च जैसे तथा छोटे छोटे सफेद रंग के होते हैं।
🥗मकोय के गुण व प्रभाव-
🥗मकोय या काकमाची त्रिदोषनाशक अर्थात वात,पित्त व कफ तीनो दोषों का शमन करने वाला है।
🥗यह तिक्त अर्थात कड़ुवा स्वाद रखने वाली तथा इसकी प्रकृति गर्म,स्निग्ध,स्वर शोधक,रसायन,वीर्य जनक,कोढ़,बवासीर,ज्वर,प्रमेह,हिचकी,वमन को दूर करने वाला तथा नेत्रों को हितकर औषधि है।
🥗यह यकृत व हृदय के रोगो को हरने वाली औषधि है।यकृत की क्रिया विधि जब विगड़ जाती है तो शरीर में अनेक उपद्रव यथा सूजन,पतले दस्त,व पीलिया जैसे रोगो के अलाबा कई बार बवासीर जैसे रोग होने लगते हैं।इन रोगों में मकोय का सेवन बहुत ही लाभप्रद रहता है।
🥗यह औषधि यकृत की क्रियाविधि को धीरे धीरे सुद्रढ़ करके रोग का विनाश कर देती है।इस औषधि के प्रयोग से यकृत संवंधी रोग धीमें धीमें समाप्त हो जाते हैं।
🥗इस औषधि के पत्तों का रस आँतों में पहुँचकर वहाँ इकठ्ठे विषों का विनाश कर देता है तथा पेशाब द्वारा शरीर से बाहर कर दिया जाता है।
🥗शरीर में कहीं सूजन हो या फिर यकृत व हृदय में सूजन हो तो इस औषधि के पत्तों का रस पिलाना लाभकारी है।
🥗खूनी बबासीर में या मुँह के किसी भी हिस्से से रक्त स्त्राव में मकोय के पत्तों का रस लाभप्रद है।
🥗हृदय रोग में इसके फल देने से रोग मिट जाता है।
🥗जलोदर रोग में मकोय के फल देने से रोग मिटने लगता है।
🥗नेत्रों के रोगों में भी इस औषधि मकोय का प्रयोग बहुत ही हितकारी है।
🥗मकोय का रस तैयार करना:-
मकोय का रस निकाल कर उसे मिट्टी के बर्तन में भरकर धीमी अग्नि पर गर्म करें,धीरे धीरे उसका हरा रंग बादामी रंग में बदल जाता है,तब इसे उतार कर छान लें।
🥗इस प्रकार तैयार रस को 50-100ग्राम की मात्रा में लेने पर यकृत के रोग, बड़ी हुयी तिल्ली, हृदय संबंधी रोग दूर होने लगते हैं।
🥗यदि शरीर में खुजली की शिकायत हो तथा वह मिट नही रही हो तो मकोय के रस की 25 से 50 ग्राम की मात्रा लेते रहने से यह मिट जाऐगी।
🥗इससे शरीर का रक्त शुद्ध हो जाता है।और रक्त से जुड़े सभी रोग मिट जाते हैं।
🥗किसी चिकित्सक के सानिध्य में मकोय का रस लेते रहने पर गठिया,संधिवात,प्रमेह,कफ,जलोदर,सूजन,बवासीर,यकृ और तिल्ली के रोगों को मिटाया जा सकता है।हृदय रोग में इसके काले फल देने से मूत्र ज्यादा मात्रा में लाकर तथा पसीना लाकर यह रोगी को आराम प्रदान कर देता है
🥗इसका प्रयोग एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग से उत्पन्न रिऐक्सन में भी फायदा करता है।
🥗मकोय के काले फल खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होते है । गांव के लोग बड़े चाव से खाते है ,इसके पत्ते वैसे भी चबा कर खा सकते है । चटनी के रूप में या आलू के साथ भुर्जी बनाकर सब्जी के रूप भी खाया जा सकता है।
नोट:- आयुर्वेदिक औषधि लेने से पहले वैधानिक चेतावनी:-
स्वदेशी और अच्छी गुणवत्ता वाली औषधियों का प्रयोग करें। बिना वैद्य की सलाह के कोई भी औषधि न लें, और यदि कोई साइड इफेक्ट या अनुपात में समस्या हो, तो तुरंत अपने पास के वैद्य से संपर्क करें। स्वास्थ्य और उनकी सलाह का पालन करें। आयुर्वेदिक चिकित्सा का पालन करते समय आश्वासन बनाए रखें कि आप विशेष रूप से आपके लिए निर्दिष्ट औषधियों और खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं जैसे कि आपके वैद्य ने सुझाया है।
स्रोत : –
🥗 ब्रह्मचर्य औषधि समाधान 🥗
जानकारी को संकलित किया गया : –
🌷राकेश कुमार चंद्रवंशी (चन्द्रा जी)🌷 द्वारा
ईश्वर से आपके उत्तम स्वास्थ्य की मंगलकामना करते हैं।
-:।आपका दिन शुभ हो।:-
-:धन्यवाद:-